संजय द त्त की स जा माफ़ होनी चाहिये।
क़भी क़भी इंसान को छोटी सी ग़लती के लिए जीवन भर सजा भुगतनी पड़ती है। यह तो साफ़ जाहिर है कि संजय दत्त की मानसिकता अपराधिक प्रवृति क़ी नहीं है। यदि वह अपराधिक प्रवर्ति के होते तो न जाने अब तक कितने ग़ुनाह कर चुके होते। इंसान की मनसिकता को देखते हुए सुप्रीमकोर्ट को भी अपने अपने फ़ैसले मैं संशोधन करना चाहिये। संजय दत्त की पारिवारिक प्रष्टभूमी को देखा जाये तो उनके माता पिता सुनीलदत्त और नर्गिसजी दोनों ही समाजसेवी , प्रेमभावी देशभक्त व् सेवाभावी तथा आदर्श नागरिक थे। देश समाज और परिवार के लिए उनके योगदान को भूलाया नहीं जा सकता। कभी कभी एक मुजरिम को सजा देते समय उसकी पारिवारिक पृष्टभूमि पर भी एक नजर डाल लेनी चाहिये। और साथ ही यह भी देखना जरुरी है कि २० -२५ साल के इस जीवन मे उसने और कितने अपराध किये है और जब उसने नाजायज हथियार रखने का अपराध किया था ,तब वह नशे की गिरफ्त में थे और क़ानून की निगाह में तो नशे की हालत में किया गया खून भी माफ़ होता है। और बॉम्बे ब्लास्ट के असली अपराधी तो आज भी कानून की पहुँच से बाहर है। जो इंसान कानून की गिरफ्त में है उस पर कानून अपना शिकंजा कसता ही जाता है ऎसे अपराधी जो देश के लिए खतरा न हों समाज और परिवार को कोई नुकसान न पहुचा रहे हो उन्हे सजा देते वक्त कानून को थोडा लचीला होना चाहिए १६ दिसम्बर वाली दुष्कर्म की दरदनाक घटना के जंघन्य अपराधी छोटू को नाबालिग करार देते हुए बाल सुधार गृह में भेज दिया गया यह जानते हुए भी कि ऎसे अपराधी देश और समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित होंगे सबूतों पर चलने वाला कानून ' जन्म प्रमाणपत्र के बिना कैसे किसी को बालिग और नाबालिग घोषित कर सकता है। क्या यह कानून का लचीलापन नहीं है वैसे तो राष्ट्रपति को भी अधिकार है कि ऎसे अपराधियों की सजा पेर विचार करें मनोरंजन के फ़ील्ड में संजयदत्त और उनके परिवार के योगदान को देखते हुए उनकी बाकी की सजा माफ़ की जाये देश की जनता की तरफ से ये मेरी प्रार्थना है।
क़भी क़भी इंसान को छोटी सी ग़लती के लिए जीवन भर सजा भुगतनी पड़ती है। यह तो साफ़ जाहिर है कि संजय दत्त की मानसिकता अपराधिक प्रवृति क़ी नहीं है। यदि वह अपराधिक प्रवर्ति के होते तो न जाने अब तक कितने ग़ुनाह कर चुके होते। इंसान की मनसिकता को देखते हुए सुप्रीमकोर्ट को भी अपने अपने फ़ैसले मैं संशोधन करना चाहिये। संजय दत्त की पारिवारिक प्रष्टभूमी को देखा जाये तो उनके माता पिता सुनीलदत्त और नर्गिसजी दोनों ही समाजसेवी , प्रेमभावी देशभक्त व् सेवाभावी तथा आदर्श नागरिक थे। देश समाज और परिवार के लिए उनके योगदान को भूलाया नहीं जा सकता। कभी कभी एक मुजरिम को सजा देते समय उसकी पारिवारिक पृष्टभूमि पर भी एक नजर डाल लेनी चाहिये। और साथ ही यह भी देखना जरुरी है कि २० -२५ साल के इस जीवन मे उसने और कितने अपराध किये है और जब उसने नाजायज हथियार रखने का अपराध किया था ,तब वह नशे की गिरफ्त में थे और क़ानून की निगाह में तो नशे की हालत में किया गया खून भी माफ़ होता है। और बॉम्बे ब्लास्ट के असली अपराधी तो आज भी कानून की पहुँच से बाहर है। जो इंसान कानून की गिरफ्त में है उस पर कानून अपना शिकंजा कसता ही जाता है ऎसे अपराधी जो देश के लिए खतरा न हों समाज और परिवार को कोई नुकसान न पहुचा रहे हो उन्हे सजा देते वक्त कानून को थोडा लचीला होना चाहिए १६ दिसम्बर वाली दुष्कर्म की दरदनाक घटना के जंघन्य अपराधी छोटू को नाबालिग करार देते हुए बाल सुधार गृह में भेज दिया गया यह जानते हुए भी कि ऎसे अपराधी देश और समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित होंगे सबूतों पर चलने वाला कानून ' जन्म प्रमाणपत्र के बिना कैसे किसी को बालिग और नाबालिग घोषित कर सकता है। क्या यह कानून का लचीलापन नहीं है वैसे तो राष्ट्रपति को भी अधिकार है कि ऎसे अपराधियों की सजा पेर विचार करें मनोरंजन के फ़ील्ड में संजयदत्त और उनके परिवार के योगदान को देखते हुए उनकी बाकी की सजा माफ़ की जाये देश की जनता की तरफ से ये मेरी प्रार्थना है।